Thursday, March 27, 2014

Fasale aise bhi hoge

Gäzäl - naämaä
Lyric by Adeem Hashmi
फ़ासले ऐसे भी होंगे
ये कभी सोचा न था
सामने बैठा था मेरे
और वो मेरा न था।

वो कि ख़ुशबू की तरह
फैला था मेरे चार सू
मैं उसे महसूस कर सकता था
छू सकता न था।

रात भर पिछली ही आहट
कान में आती रही
झाँक कर देखा गली में
कोई भी आया न था।

ख़ुद चढ़ा रखे थे
तन पर अजनबीयत के गिलाफ़
वर्ना कब एक दूसरे को
हमने पहचाना न था।

याद कर के और भी
तकलीफ़ होती थी’अदीम’
भूल जाने के सिवा
अब कोई भी चारा न था।

No comments:

Post a Comment